सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद 2017 में देश में लोकपाल व्यवस्था आना तय माना जा रहा है। तीन साल पहले संसद से लोकपाल कानून पास चुका है। लेकिन अभी तक उसे लागू करने के उपाय नहीं किए गए हैं। जबकि पूरे अन्ना आंदोलन की मांग लोकपाल बनाना था और लोकपाल कानून बनने के साथ यह समाप्त हो गया था।
ऐसे में लोकपाल को अमली जामा पहनने में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब-तलब कर लिया है। ऐसे में सरकार की कोशिश होगी कि बजट सत्र के दौरान लोकपाल कानून में जरूरी संशोधन कराकर मार्च या अप्रैल में केंद्र में लोकपाल का गठन कर लिया जाए।
लोकपाल के गठन के साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों और बड़े मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत सीधे लोकपाल तक पहुंचेगी और इसकी जांच में सरकार की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। पिछले दो दशक से सीबीआइ को सरकार के दबाव से मुक्त रखने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश भी बेकार साबित हुई है। 2जी और कोयला घोटाले के सिलसिले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'पिंजड़े में बंद तोता' तक करार दिया। लेकिन लोकपाल के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। लोकपाल बनने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक ऐसी जांच एजेंसी सामने होगी, जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा।
जाहिर है 2017 में बेनामी संपत्ति कानून और लोकपाल भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू की गई लड़ाई को नई धार देगा। लेकिन विधानसभा चुनावों के परिणाम से इस लड़ाई के प्रभावित होने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। नोटबंदी के बाद अभी तक हुए सभी स्थानीय निकायों व उप चुनावों में भाजपा को भारी सफलता मिली है। इसे सरकार और पार्टी नोटबंदी के प्रति जनता के समर्थन के रूप में देख रही है। उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में यह सिलसिला जारी रहता है, तो भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ लड़ाई और तेज होना तय है।
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