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Thursday, 29 December 2016

सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख



सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद 2017 में देश में लोकपाल व्यवस्था आना तय माना जा रहा है। तीन साल पहले संसद से लोकपाल कानून पास चुका है। लेकिन अभी तक उसे लागू करने के उपाय नहीं किए गए हैं। जबकि पूरे अन्ना आंदोलन की मांग लोकपाल बनाना था और लोकपाल कानून बनने के साथ यह समाप्त हो गया था।
ऐसे में लोकपाल को अमली जामा पहनने में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब-तलब कर लिया है। ऐसे में सरकार की कोशिश होगी कि बजट सत्र के दौरान लोकपाल कानून में जरूरी संशोधन कराकर मार्च या अप्रैल में केंद्र में लोकपाल का गठन कर लिया जाए।
लोकपाल के गठन के साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों और बड़े मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत सीधे लोकपाल तक पहुंचेगी और इसकी जांच में सरकार की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। पिछले दो दशक से सीबीआइ को सरकार के दबाव से मुक्त रखने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश भी बेकार साबित हुई है। 2जी और कोयला घोटाले के सिलसिले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'पिंजड़े में बंद तोता' तक करार दिया। लेकिन लोकपाल के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। लोकपाल बनने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक ऐसी जांच एजेंसी सामने होगी, जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा।
जाहिर है 2017 में बेनामी संपत्ति कानून और लोकपाल भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू की गई लड़ाई को नई धार देगा। लेकिन विधानसभा चुनावों के परिणाम से इस लड़ाई के प्रभावित होने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। नोटबंदी के बाद अभी तक हुए सभी स्थानीय निकायों व उप चुनावों में भाजपा को भारी सफलता मिली है। इसे सरकार और पार्टी नोटबंदी के प्रति जनता के समर्थन के रूप में देख रही है। उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में यह सिलसिला जारी रहता है, तो भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ लड़ाई और तेज होना तय है।
Tags: #Indian judicial services Aspirants group 
 

साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने दिए ऐसे फैसले जिन्होंने रचा इतिहास


1-मां-बाप से अलग करने के लिए मजबूर करना बना तलाक का आधार
इसी साल अक्टूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हिन्दू समाज में एक लड़के का पवित्र दायित्व है कि वो अभिभावकों की देखभाल करे। अगर पत्नी इस बात के लिए विवश करे कि पति अपने माता-पिता से अलग रहे तो यह क्रूरता है, जिसके कारण वह तलाक मांग सकता है। यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश अनिल आर दवे और एल. नागेश्वर राव की पीठ ने कर्नाटक के एक तालक के मामले में की थी। कहा था कि भारत में हिन्दू बेटों के लिए यह सामान्य या वांछनीय संस्कृति नहीं है कि वो शादी के बाद अपने परिवार से पत्नी के कहने पर परिवार से अलग हो जाए, वो भी तो बिल्कुल नहीं जब पूरे परिवार में अकेला बेटा ही कमाने वाला हो। एक माता पिता अपने बेटे की शिक्षा से लेकर हर तरह की परवरिश करते हैं। ऐसे में बेटे का कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वो माता पिता की से देखभाल करे।
2-राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शराब की बिक्री


सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिसंबर को दिए आदेश में कहा था कि राष्‍ट्रीय राजमार्गों और राज्य के राजमार्गों से पांच सौ मीटर यानी आधा किलोमीटर के दायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह आदेश दिया है। याचिका में कोर्ट से निवेदन किया गया था कि यह सुनिश्चित किया जाए कि हाईवे के किनारे शराब की बिक्री न हो। आदेश में कहा गया है कि जिनके पास लाइसेंस हैं वो खत्म होने तक या 31 मार्च 2017 तक जो पहले हो, तक इस तरह की दुकानें चल सकेंगी। मतलब 1 अप्रैल 2017 से राजमार्गों के किनारे शराब नहीं बिकेगी। न्यायालय का यह फैसला सभी राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। आदेश में कहा गया है कि राजमार्गों के किनारे लगे शराब के सारे विज्ञापन और साइन बोर्ड हटाए जाएंगे। साथ ही राज्यों के मुख्य सचिव और डीजीपी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कराने की निगरानी करेंगे।

3 सिनेमाघरों में राष्ट्रगान


इस साल नवंबर के आखिरी दिन यानी 30 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने भोपाल में गैर सरकारी संगठन (NGO) चलाने वाले श्याम नारायण की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि देश के हर सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाए और लोग खड़े होकर इसका सम्मान करें। राष्ट्रगान जब बजाया जाए तो स्क्रीन पर देश का झंडा दिखाया जाए। सर्वोच्च न्यायालयने यह भी कहा था कि अब समय आ गया है जब सभी लोग यह महसूस करें कि वे एक राष्ट्र में रहते हैं। बेंच ने कहा, 'जब राष्ट्रगान बजाया जाय तो सबको इसके प्रति आदर और सम्मान का भाव दिखाना जरूरी है। यह उनमें देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना भरेगा।' हालांकि इसका बड़े स्तर पर विरोध भी हुआ था। फैसला सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दिए होने के कारण लोग खुल कर इसे विरोध में तो नहीं उतरे लेकिन सोशल साइट्स पर लोगों ने इस न्यायालय के इस फैसले पर सवाल उठाए। गौरतलब है कि वर्ष 1975 से पहले भी सिनेमाहालों में राष्‍ट्रगान बजाया जाता था। पर 1975 में राष्‍ट्रगान बजते वक्त उसे उचित सम्मान ना मिल पाने के कारण इसे बंद कर दिया गया था। राष्ट्रगान के संबंध में 2003 में महाराष्ट्र सरकार ने आदेश दिया था कि थिएटर में फिल्म शुरू होने से पहले इसे बजाया जाए।


4-पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटूज को सुप्रीम कोर्ट ने दी अवमानना की नोटिस


इसी साल सर्वोच्च न्यायालय ने एक और इतिहास रचा, जब अपने ही पूर्व न्यायाधीश को हाजिर होने के लिए कहा था। मामला पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू से जुड़ा हुआ था। उन्होंने सौम्या मर्डर केस में जजों के फैसले पर टिप्पणी की थी। केरल के चर्चित सौम्या मर्डर केस में दोषी गोविंदाचामी की फांसी की सजा रद्द करने को एक गलत फैसला बताने पर बताने पर जस्टिस मार्कंडेय काटजू को सुप्रीम कोर्ट ने समन किया है।केस की सुनवाई कर रही तीन जजों की बेंच ने नोटिस में कहा था कि काटजू कोर्ट में पेश होकर अपनी बात रखें। काटजू ने सौम्या के मर्डर पर फैसला आने के बाद अपनी फेसबुक पोस्ट में कहा था कि मैंने फैसले को पढ़ा है, इसमें कई खामियां हैं। उन्होंने लिखा कि गाविंदाचामी को मर्डर के चार्ज से बरी करना बड़ी गलती है

5-बची उत्तराखंड सरकार
उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार पर मंडरा रहे संकट के बादल को सर्वोच्च न्यायालय ने इसी साल 11 मई को फ्लोर टेस्ट के नतीजे का एलान कर हटाया। कोर्ट ने कहा था इस रावत के पक्ष में 33 विधायक थे और बीजेपी के पक्ष में 28। इसी के बाद राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया था। इस फैसले से भाजपा, यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को विपक्ष ने घेर लिया था।



6-रेप पीड़िता को मिली गर्भपात की इजाजत
इस साल सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भवती महिला को गर्भधारण के 24 हफ्ते बाद अबॉर्शन कराने की इजाजत दी थी। गौरतलब है कि कोई भी महिला अपने 20 हफ्ते के भ्रूण का ही गर्भपात करा सकती है। न्यायालय ने यह फैसला उस महिला की याचिका पर दिया था जिसने कहा था कि गर्भ में उसका बच्चा विकृत है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया था। इस मेडिकल बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी थी कि भ्रूण की वजह से मां की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। इसी को आधार मानते हुए कोर्ट ने गर्भपात कराने की इजाजत दी है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में मुंबई की रेप पीड़ित महिला ने इस एक्ट को अंसवैधानिक बताते हुए चुनौती दी थी और गर्भपात कराने की इजाजत मांगी थी। महिला को जब पता चला वह गर्भवती है तो उसने कई मेडिकल टेस्ट कराए, जिससे पता चला कि अगर वह गर्भपात नहीं कराती तो उसकी जान जा सकती है।



सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा- फिलहाल टोल फ्री रहेगा नोएडा DND


7-नोएडा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से 2012 में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर में यह कहते हुए इस फ्लाइवे को टोल फ्री कर दिया था कि टोल कानूनी प्रावधान के अनुकूल नहीं है। इसके बाद मामले से जुड़ा दूसरा पक्ष सर्वोच्च न्यायालय चला गया। जहां से फैसला आया कि फिलहाल डीएनडी टोल फ्री रहेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ नोएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड (NTBCL) सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी।





MBBS के लिए NEET

8-इसी साल अप्रैल महीने में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसले में साल 2015 से ही देशभर के कॉलेजों में MBBS और BDS पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए एक ही कॉमन टेस्ट NEET को हरी झंडी दे दी थी। यानी अब देशभर के सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले इसी के आधार पर होंगे।

Disabilities Bill, 2016

Disabilities Bill, 2016
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The Parliament has passed the Right of Persons with Disabilities Bill, 2016 in order to replace the Persons with Disabilities Act, 1995.

This Bill was passed by the Parliament in order to make the laws of our country in conformity with Convention on the Rights of Persons with Disabilities 2006 to which India is a signatory.

As per this bill, persons with at least 40% of a disability are categorized as benchmark disabled.

Watch the info-graphics below in order to know about the most important rights and special provisions of disabled persons under the new bill.


Taking Cognizance

#PRE - #APPEARANCE #STAGE

Taking Cognizance

The process of taking cognizance has been included in Chapter XIV of Code of Criminal Procedure, 1973 under the head ‘Conditions requisite for initiation of proceedings’. Taking cognizance is a prerequisite for initiation of proceedings. So, in fact, taking cognizance itself is not initiation of proceedings and it is only a condition which is required for initiation of proceedings. Sec. 190 to 199 deal with the process of taking cognizance. The provisions contained in Sec.195 to 199 prescribe the bar to taking cognizance in certain circumstances mentioned therein.

Sec.190 which deals with cognizance of offence by Magistrates reads as
follows:

Cognizance of offences by Magistrates.- Subject to the provisions of this Chapter, any Magistrate of the first class, specially empowered in this behalf under sub-section (2), may take cognizance of any offence-

(a) Upon receiving a complaint of facts which constitute such offence;
(b) Upon it police report of such facts;
(c) Upon information received from any person other than a police officer,
or upon his own knowledge, that such offence has been committed.

(2) The Chief Judicial Magistrate may empower any Magistrate of the second class  to take cognizance under sub-section (1) of such offences as are within his competence to inquire into or try.

Attempt to Murder under Section 307, IPC

Attempt to Murder under Section 307, IPC

Section 307 IPC is about attempt to murder and in the section a lot of weightage has been given to the intention and the knowledge of the accused and the preparation that he takes before committing the crime.

The attempt to murder under section 307 IPC is a very interesting section, in the sense that it has lots of similarities with section 324 IPC, which deals with voluntarily causing hurt using dangerous weapons. Sometimes it is seen that it is very difficult to differentiate between the cases under section 307 and cases under 324,325,326 because all these offences have some common ingredients among themselves. The offence of attempt to murder is a very serious offence because it is not very different from the offence of murder itself. The only difference between the two offences is the death of the victim which is not present under section 307.

👉The main ingredients under section 307 are

▪The act attempted should be of such a nature that if not prevented or intercepted, it would lead to the death of the victim.

▪The intention or mens rea to kill is need to be proved clearly without doubt, for this purpose the prosecution can make use of the circumstances like attack by dangerous weapons on vital parts of the body however the intention to kill cannot be gauged simply by the seriousness of the injury caused.

▪The intention and the knowledge of the result of the act being done is the main thing that is needed to be proved for conviction under section 307.

Maintenance - Section 125 of cr.pc

Maintenance

👉Maintenance denied for working wife. (High Court Madras), Hbl A. S. Venkatachalamoorthy J., order on 21-06-2002, Kumaresan Vs Aswathi. Citation No. (2002) 2 MLJ 760.

👉No maintenance for capable and working wife. (High Court Maharastra), Hbl J. C. Chitre J., order on 24-03-2000, Smt. Mamta Jaiswal Vs Rajesh Jaiswal. Citation No. 2000 (4) MPHT 457; II (2000) DMC 170.

👉No maintenance to earning wife, only to children. (High Court Karnataka), Hbl K. Manjunath J., order on 22-08-2005, AIR 2005 Kant 417, ILR 2005 KAR 4981, Dr. E. Shanthi Vs Dr. H K. Vasudev.

👉No Maintenance to working wife in 125 CrPC. (High Court Madras), Hbl P. Sathasivam J., order on 21-01-2003, Manokaran @ Ramamoorthy Vs M. Devaki. Citation Nos. AIR 2003 Mad 212; I (2003) DMC 799; (2003) I MLJ 752 (Mad), CMP No. 16264 of

👉No maintenance U/s 125 CrPC when wife deserts hubby without cause and also she is earning. No Maintenance to capable wife, but only to child and no maintenance to wife living in adultery. (HC Uttaranchal), Hbl J. Alok Singh, order on 18-11-2009, Crl. Rev. No. 201 of 2006, Smt. Archana Gupta & ors Vs Rajeev Gupta.

👉Wife should clear that she is unable to maintain herself. (HC Allahabad), Hbl J. B. Katju, order on 25-03-1976, Manmohan Singh Vs Smt. Mahindra Kaur. Citation No. 1976 Cri LJ 1664.

👉No Maintenance if wife is working. (HC Uttaranchal), Hbl J. Dharamveer, order on 25-10-2010, Crl Rev. No. 88 of 2002, Vikas Jain Vs Deepali @ Ayushi. Citation No. LAWS (UTN) 2010-1-36.

धारा 307 - हत्या का प्रयास

धारा 307  हत्या का प्रयास

1.       ’प्रयत्न’ का विधि एवं तथ्यों से गठन होता है। जो प्रकरण में विद्यमान परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं। धारा 307 में मानव वध का ’प्रयत्न’ स्थापित करने हेतु यह आवश्यक नहीं है कि आहत को ऐसी शारीरिक क्षति पहुचायी जाये जो उसकी मृत्यु कारित कर दे। यह भी आवश्यक नहीं है कि ऐसी क्षति से प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में आहत की मृत्यु संभव हो। विधि में केवल यह देखना होता है कि अभियुक्त की इच्छा का परिणाम उसका प्रत्यक्ष कृत्य है।

 संदर्भ:- भैयाराम मिंज विरूद्ध म.प्र.राज्य 2000(4) एम.पी.एच.टी. 437

2.        महाराष्ट्र राज्य विरूद्ध बलराम बामा पाटिल, ए.आई.आर 1983 सु.को. 305 में धारा 307 की परिधि एवं विस्तार पर विचार करते हुये यह अभिनिर्धारित किया गया है कि धारा-307 के अंतर्गत दोष-सिद्धि को उचित ठहराने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि ऐसी शारीरिक उपहति कारित की गयी हो जो मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त हो। यद्यपि वास्तविक रूप से कारित उपहति की प्रकृति अभियुक्त के मंतव्य के बारे में विनिश्चय करने में पर्याप्त सहायक हो सकती है, लेकिन ऐसा मंतव्य अन्य परिस्थितियों के आधार पर भी तथा कतिपय मामलों में वास्तविक उपहति के संदर्भ के बिना भी विनिश्चय किया जा सकता है।

 3.         धारा-307 अभियुक्त के कृत्य तथा उसके परिणाम के बीच विभेद करती है तथा जहा तक आहत व्यक्ति का संबंध है, यद्यपि कृत्य से वैसा परिणाम नहीं निकला हो लेकिन फिर भी अभियुक्त इस धारा के अधीन दोषी हो सकता है। यह भी आवश्यक नहीं है कि पहुचायी गयी उपहति परिस्थितियों के सामान्य क्रम में आहत की मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त हो। न्यायालय को वस्तुतः यह देखना है कि अभियुक्त का कृत्य उसके परिणाम से भिन्न क्या ’संहिता’ की धारा 300 में प्रावधित आशय अथवा ज्ञान की परिस्थितियों के साथ किया गया।

4.        ’संहिता’ की धारा-307 के अंतर्गत हत्या के प्रयास का अपराध गठित करने के लिये यह देखना आवश्यक है कि चोट की प्रकृति क्या थी, चोट कारित करने के लिये किस स्वरूप के हथियार का प्रयोग, कितने बल के साथ किया गया। घटना के समय प्रहारकर्ता ने अपना मनोउद्देश्य किस रूप से तथा किन शब्दों को प्रकट किया ? उसका वास्तविक उद्देश्य क्या था ? आघात के लिये आहत व्यक्ति के शरीर के किन अंगों को चुना गया ? आघात कितना प्रभावशाली था ? उक्त परिस्थितियों के आधार पर ही यह अभिनिर्धारित किया जा सकता है कि वास्तव में अभियुक्त का उद्देश्य हत्या कारित करना था अथवा नहीं,
संदर्भ:- म.प्र.राज्य बनाम रामदीन एवं पाच अन्य-1990, करेन्ट क्रिमिनल जजमेंट्स 228.
A Constitution Bench of the Supreme Court in Lalita Kumari v. Govt. of U.P [W.P.(Crl) No; 68/2008] held that registration of First Information Report is mandatory under Section 154 of the Code of Criminal Procedure , if the information discloses commission of a cognizable offence and no preliminary inquiry is permissible in such a situation.

#ललिता #कुमारी v #स्टेट #ऑफ #यूपी

सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिकी यानि की एफआईआर दर्ज करने को अनिवार्य बनाने का फैसला दिया है। एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी न्यायालय ने दिया है। न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि एफआईआर दर्ज होने के एक सप्ताह के अंदर प्राथमिक जांच पूरी की जानी चाहिए। इस जांच का मकसद मामले की पड़ताल और गंभीर अपराध है या नहीं जांचना है। इस तरह पुलिस इसलिए मामला दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है कि शिकायत की सच्चाई पर उन्हें संदेह है।
#जीरो #एफ #आई #आर

अक्सर FIR दर्ज करते वक़्त आगे के कार्यवाही को सरल बनाने हेतु इस बात का ध्यान रखा जाता हैं कि घटनास्थल से संलग्न थाने में ही इसकी शिकायत दर्ज हो परन्तु कई बार ऐसे मौके आते हैं जब पीड़ित को विपरीत एवं विषम परिस्थितियों में किसी बाहरी पुलिस थाने में केस दर्ज करने की जरुरत पड़ जाती हैं. मगर अक्सर ऐसा देखा जाता हैं कि पुलिस वाले अपने सीमा से बहार हुई किसी घटना के बारे में उतने गंभीर नहीं दिखाए देते. ज्ञात हो कि FIR आपका अधिकार हैं एवं आपके प्रति हो रही असमानताओ का ब्यौरा भी, अतः सरकार ने ऐसे विषम परिस्थितियों में भी आपके अधिकारों को बचाए रखने हेतु ZERO FIR का प्रावधान बनाया है. इसके तहत पीड़ित व्यक्ति अपराध के सन्दर्भ में अविलम्ब कार्यवाही हेतु किसी भी पुलिस थाने में अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं एवं बाद में केस को उपरोक्त थाने में ट्रान्सफर भी करवाया जा सकता हैं.

👉कब करे zero FIR का उपयोग:

हत्या, रेप एवं एक्सीडेंट्स जैसे अपराध जगह देखकर नहीं होती या फिर ऐसे केसेस में ये भी हो सकता है कि अपराध किसी उपरोक्त थाने की सीमा में न घटित हो. ऐसे केसेस में तुरंत कार्यवाही की मांग होती है परन्तु बिना FIR के कानून एक कदम भी आगे नहीं चल पाने में बाध्य होती हैं. अतः ऐसे मौको में मात्र कुछ आई-विटनेस एवं सम्बंधित जानकारियों के साथ आप इसकी शिकायत नजदीकी पुलिस स्टेशन में करवा सकते हैं. ध्यान रहे लिखित कंप्लेंट करते वक़्त FIR की कॉपी में हस्ताक्षर कर एक कॉपी अपने पास रखना न भूले.

ये ज्ञात हो की FIR दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया को आगे बढाने की सारी ज़िम्मेदारी पुलिसवालो का प्रधान उद्देश्य होती हैं अतः कोई भी पुलिस वाला सिर्फ ये कहकर आपका FIR लिखने से मना नहीं कर सकता कि “ ये मामला हमारे सीमा से बाहर का है”

👉कैसे करे zero फिर:

सामान्य FIR के तरह ही zero FIR भी लिखित या मौखिक में करवाई जा सकती हैं. यदि आप चाहे तो पुलिस वाले से रिपोर्ट को पढने का भी अनुरोध कर सकते हैं. ध्यान दे की FIR लिखने के बाद पुलिस अबिलम्ब उस केस के छानबीन में जुट जाये.

याद रखे की विषम परिस्थितयों में आपके द्वारा दिखाई गयी सूझ-बुझ एवं जागरूकता ही आपको विषम परिस्थितयों से उबार सकती हैं. अतः हमारी आप सभी से ये ही गुजारिश हैं की सुरक्षित रहे, जागरूक रहे एवं लोगो को भी जागरूक करते रहे. ज्ञात रहे की आपके द्वारा दिखाई जागरूकता एक विकसित समाज की स्थापना करने में हमारी काफी मदद कर सकती हैं.
👉 Narasingh Das Tadpadia v. Goverdhan Das Partani, AIR 2000 SC 2946

📜In the case of taking cognizance of an offence on a police report, the Magistrate is not bound by the opinion of the investigating officer and he is competent to exercise his discretion in this behalf irrespective of the view expressed by the police in their report and decide whether the offence has been made out or not. This is because the purpose of the report u/s.173(2) Cr.P.C. which will contain the facts discovered or unearthed by the police as well as conclusion drawn by the police there from, is primarily to enable the Magistrate to satisfy himself whether on the basis of the report and the materials therein, the case for cognizance is made out or not
#पैरोल

#पैरोलः पैरोल भी कैदियों से जुड़ा एक टर्म है। इसमें कैदी को जेल से बाहर जाने के लिए एक संतोषजनक/आधार कारण बताना होता है। प्रशासन, कैदी की अर्जी को मानने के लिए बाध्य नहीं होता। प्रशासन कैदी को एक समय विशेष के लिए जेल से रिहा करने से पहले समाज पर इसके असर को भी ध्यान में रखता है। पैरोल एक तरह की अनुमति लेने जैसा है। इसे खारिज भी किया जा सकता है।

▪पैरोल दो तरह के होते हैं। पहला कस्टडी पैरोल और दूसरा रेग्युलर पैरोल

👉कस्टडी पैरोलः जब कैदी के परिवार में किसी की मौत हो गई हो या फिर परिवार में किसी की शादी हो या फिर परिवार में कोई सख्त बीमार हो, उस वक्त उसे कस्टडी पैरोल दिया जाता है। इस दौरान आरोपी को जब जेल से बाहर लाया जाता है तो उसके साथ पुलिसकर्मी होते हैं और इसकी अधिकतम अवधि 6 घंटे के लिए ही होती हैI

👉रेग्युलर पैरोलः रेग्युलर पैरोल दोषी को ही दिया जा सकता है, अंडर ट्रायल को नहीं। अगर दोषी ने एक साल की सजा काट ली हो तो उसे रेग्युलर पैरोल दिया जा सकता है।


👉क्या होता है फरलो ?

#फरलोः फरलो एक डच शब्द है। इसके तहत कैदी को अपनी सामाजिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए रिहा किया जाता है। इसे कैदी के सुधार से जोड़कर भी देखा जाता है। दरअसल, तकनीकी तौर पर फरलो कैदी का मूलभूत अधिकार माना जाता है।

👉पैरोल मिलने के कानूनी नियम

1. पूर्ण और असाध्य अंधापन।
2. कोई कैदी जेल में गंभीर रूप से बीमार है और वो जेल के बाहर उसकी सेहत में सुधार होता है।
3. फेफड़े के गंभीर क्षयरोग से पीड़ित रोगी को भी पैरोल प्रदान की जाती है। यह रोग कैदी को उसके द्वारा किए अपराध को आगे कर पाने के लिए अक्षम बना देता है। या इस रोग से पीड़ित वह कैदी उस तरह का अपराध दोबारा नहीं कर सकता, जिसके लिए उसे सजा मिली है।
4. यदि कैदी मानसिक रूप से अस्थिर है और उसे अस्पताल में इलाज की जरूरत है।

📖साथ ही भारत के अंदर कई असाधारण मामलों में भी कैदी को पैरोल दी जा सकती है।

1. अंतिम संस्कार के लिए।
2. कैदी के परिवार का कोई सदस्य बीमार हो या मर जाए।
3. किसी कैदी को बेटे, बेटी, भाई और बहन की शादी के लिए।
4. घर का निर्माण करने या फिर क्षतिग्रस्त घर की मरम्मत के लिए।