#पैरोल
#पैरोलः पैरोल भी कैदियों से जुड़ा एक टर्म है। इसमें कैदी को जेल से बाहर जाने के लिए एक संतोषजनक/आधार कारण बताना होता है। प्रशासन, कैदी की अर्जी को मानने के लिए बाध्य नहीं होता। प्रशासन कैदी को एक समय विशेष के लिए जेल से रिहा करने से पहले समाज पर इसके असर को भी ध्यान में रखता है। पैरोल एक तरह की अनुमति लेने जैसा है। इसे खारिज भी किया जा सकता है।
▪पैरोल दो तरह के होते हैं। पहला कस्टडी पैरोल और दूसरा रेग्युलर पैरोल
👉कस्टडी पैरोलः जब कैदी के परिवार में किसी की मौत हो गई हो या फिर परिवार में किसी की शादी हो या फिर परिवार में कोई सख्त बीमार हो, उस वक्त उसे कस्टडी पैरोल दिया जाता है। इस दौरान आरोपी को जब जेल से बाहर लाया जाता है तो उसके साथ पुलिसकर्मी होते हैं और इसकी अधिकतम अवधि 6 घंटे के लिए ही होती हैI
👉रेग्युलर पैरोलः रेग्युलर पैरोल दोषी को ही दिया जा सकता है, अंडर ट्रायल को नहीं। अगर दोषी ने एक साल की सजा काट ली हो तो उसे रेग्युलर पैरोल दिया जा सकता है।
👉क्या होता है फरलो ?
#फरलोः फरलो एक डच शब्द है। इसके तहत कैदी को अपनी सामाजिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए रिहा किया जाता है। इसे कैदी के सुधार से जोड़कर भी देखा जाता है। दरअसल, तकनीकी तौर पर फरलो कैदी का मूलभूत अधिकार माना जाता है।
👉पैरोल मिलने के कानूनी नियम
1. पूर्ण और असाध्य अंधापन।
2. कोई कैदी जेल में गंभीर रूप से बीमार है और वो जेल के बाहर उसकी सेहत में सुधार होता है।
3. फेफड़े के गंभीर क्षयरोग से पीड़ित रोगी को भी पैरोल प्रदान की जाती है। यह रोग कैदी को उसके द्वारा किए अपराध को आगे कर पाने के लिए अक्षम बना देता है। या इस रोग से पीड़ित वह कैदी उस तरह का अपराध दोबारा नहीं कर सकता, जिसके लिए उसे सजा मिली है।
4. यदि कैदी मानसिक रूप से अस्थिर है और उसे अस्पताल में इलाज की जरूरत है।
📖साथ ही भारत के अंदर कई असाधारण मामलों में भी कैदी को पैरोल दी जा सकती है।
1. अंतिम संस्कार के लिए।
2. कैदी के परिवार का कोई सदस्य बीमार हो या मर जाए।
3. किसी कैदी को बेटे, बेटी, भाई और बहन की शादी के लिए।
4. घर का निर्माण करने या फिर क्षतिग्रस्त घर की मरम्मत के लिए।
#पैरोलः पैरोल भी कैदियों से जुड़ा एक टर्म है। इसमें कैदी को जेल से बाहर जाने के लिए एक संतोषजनक/आधार कारण बताना होता है। प्रशासन, कैदी की अर्जी को मानने के लिए बाध्य नहीं होता। प्रशासन कैदी को एक समय विशेष के लिए जेल से रिहा करने से पहले समाज पर इसके असर को भी ध्यान में रखता है। पैरोल एक तरह की अनुमति लेने जैसा है। इसे खारिज भी किया जा सकता है।
▪पैरोल दो तरह के होते हैं। पहला कस्टडी पैरोल और दूसरा रेग्युलर पैरोल
👉कस्टडी पैरोलः जब कैदी के परिवार में किसी की मौत हो गई हो या फिर परिवार में किसी की शादी हो या फिर परिवार में कोई सख्त बीमार हो, उस वक्त उसे कस्टडी पैरोल दिया जाता है। इस दौरान आरोपी को जब जेल से बाहर लाया जाता है तो उसके साथ पुलिसकर्मी होते हैं और इसकी अधिकतम अवधि 6 घंटे के लिए ही होती हैI
👉रेग्युलर पैरोलः रेग्युलर पैरोल दोषी को ही दिया जा सकता है, अंडर ट्रायल को नहीं। अगर दोषी ने एक साल की सजा काट ली हो तो उसे रेग्युलर पैरोल दिया जा सकता है।
👉क्या होता है फरलो ?
#फरलोः फरलो एक डच शब्द है। इसके तहत कैदी को अपनी सामाजिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए रिहा किया जाता है। इसे कैदी के सुधार से जोड़कर भी देखा जाता है। दरअसल, तकनीकी तौर पर फरलो कैदी का मूलभूत अधिकार माना जाता है।
👉पैरोल मिलने के कानूनी नियम
1. पूर्ण और असाध्य अंधापन।
2. कोई कैदी जेल में गंभीर रूप से बीमार है और वो जेल के बाहर उसकी सेहत में सुधार होता है।
3. फेफड़े के गंभीर क्षयरोग से पीड़ित रोगी को भी पैरोल प्रदान की जाती है। यह रोग कैदी को उसके द्वारा किए अपराध को आगे कर पाने के लिए अक्षम बना देता है। या इस रोग से पीड़ित वह कैदी उस तरह का अपराध दोबारा नहीं कर सकता, जिसके लिए उसे सजा मिली है।
4. यदि कैदी मानसिक रूप से अस्थिर है और उसे अस्पताल में इलाज की जरूरत है।
📖साथ ही भारत के अंदर कई असाधारण मामलों में भी कैदी को पैरोल दी जा सकती है।
1. अंतिम संस्कार के लिए।
2. कैदी के परिवार का कोई सदस्य बीमार हो या मर जाए।
3. किसी कैदी को बेटे, बेटी, भाई और बहन की शादी के लिए।
4. घर का निर्माण करने या फिर क्षतिग्रस्त घर की मरम्मत के लिए।
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